कहानी में परिवार और धर्मस्थल — दोनों जगह स्वार्थपरता और हिंसा स्पष्ट रूप से उजागर होती है।
पारिवारिक स्वार्थ: हरिहर काका के भाइयों की पत्नियाँ उन्हें बचा-खुचा रूखा-सूखा भोजन देती थीं। जब काका ने ज़मीन लिखने से मना किया, तो सगे भाइयों ने हथियार उठाकर धमकी दी — "लिखो, नहीं तो जान से मार देंगे" — और मारपीट कर ज़बरन अँगूठे के निशान लिए।
धार्मिक संस्था की हिंसा: महंत ने पहले प्रलोभन दिया, फिर रात को सशस्त्र दल भेजकर काका का अपहरण किया और बंधक बनाकर जबरन कागज़ों पर अँगूठे के निशान लिए।
इस प्रकार कहानी सिद्ध करती है कि जब संपत्ति का स्वार्थ हावी हो जाता है, तो रक्त-संबंध और धर्म दोनों हिंसा का रूप धारण कर लेते हैं।
Source: हरिहर काका, अध्याय 1
---