'मनुष्यता' कविता में कवि मैथिलीशरण गुप्त ने उस जीवन को व्यर्थ बताया है जो केवल स्वयं के लिए जिया जाए। कवि कहते हैं —
> "हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
> मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।"
अर्थात् जो व्यक्ति दूसरों के लिए कुछ नहीं करता, केवल अपने स्वार्थ के लिए जीता है, उसका जीवन और मृत्यु दोनों व्यर्थ हैं। ऐसी प्रवृत्ति को कवि ने 'पशु-प्रवृत्ति' कहा है। सच्चा मनुष्य वही है जो परोपकार करे और दूसरों के लिए जिए।
Source: मनुष्यता (कविता), स्पर्श — Chapter 3
---