Q1. [5]
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़ै बन माँहि ।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहिं ।।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि ।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि ।।
निम्नलिखित पठित पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए :
- (i) 'कस्तूरी कुंडलि बसै ...' दोहे में किसका वर्णन किया गया है ? [1]
- A कस्तूरी ढूँढ़ने वाले मृग का
- B सांसारिकता में लीन मानव का
- C अपनी ही विशेषता से अनजान मनुष्य का
- D ईश्वर की सर्वव्यापकता का
- (ii) 'जब मैं था तब हरि नहीं' पंक्ति में 'मैं' से अभिप्राय है – [1]
- A अहंकार की भावना
- B स्वार्थ की भावना
- C सांसारिक माया-मोह
- D स्वयं कवि
- (iii) 'जब मैं था तब हरि नहीं' दोहे के अनुसार हृदय में ईश्वर का निवास कब तक असंभव है ? [1]
- A जब तक सच्चे हृदय से उसे याद न किया जाए ।
- B जब तक सांसारिक विषय-वासनाओं को न छोड़ा जाए ।
- C जब तक अहंकारपूर्ण व्यवहार का नाश न किया जाए ।
- D जब तक सच्चे हृदय से उसकी सेवा न की जाए ।
- (iv) 'जब दीपक देख्या माँहि' – पंक्ति में 'दीपक' प्रतीकार्थ है – [1]
- A प्रभु प्रेम के प्रकाश का
- B रोशनी के साधन का
- C प्रकाश का
- D संपन्नता का
- (v) निम्नलिखित कथन तथा कारण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और दिए गए विकल्पों में से कोई एक सही विकल्प चुनकर लिखिए :
कथन : ईश्वर सृष्टि के कण-कण में निवास करते हैं पर हम उन्हें देख नहीं पाते ।
कारण : मनुष्य के पास दिव्य-दृष्टि नहीं है । [1]
- A कथन तथा कारण दोनों गलत हैं ।
- B कथन गलत है, लेकिन कारण सही है ।
- C कथन सही है, लेकिन कारण उसकी गलत व्याख्या करता है ।
- D कथन तथा कारण दोनों सही हैं तथा कारण कथन की सही व्याख्या करता है ।
Previously asked in CBSE board exam
2024 4/2/1 Q7
Generated by claude-sonnet-4-6 · 2026-06-15 10:18 · grounding stimulus+chapter
Model Answer
(i) D — ईश्वर की सर्वव्यापकता का
(ii) A — अहंकार की भावना
(iii) C — जब तक अहंकारपूर्ण व्यवहार का नाश न किया जाए ।
(iv) A — प्रभु प्रेम के प्रकाश का
(v) C — कथन सही है, लेकिन कारण उसकी गलत व्याख्या करता है ।
Source: साखी – कबीर, स्पर्श (काव्य खंड)
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Explanation
- (i) दोहे में मुख्य संदेश ईश्वर की सर्वव्यापकता है — राम (ईश्वर) घट-घट में बसे हैं, पर दुनिया देखती नहीं।
- (ii) 'मैं' = अहंकार। जब तक 'मैं' (अहं) है, तब तक हरि नहीं मिलते — यह कबीर का केंद्रीय भाव है।
- (iii) दोहे के अनुसार 'मैं' (अहंकार) के रहते हरि नहीं आते — इसलिए अहंकार का नाश आवश्यक है।
- (iv) 'दीपक' यहाँ ज्ञान/प्रभु प्रेम के प्रकाश का प्रतीक है जो अज्ञान रूपी अँधियारा मिटाता है।
- (v) कथन सही है (ईश्वर कण-कण में है), लेकिन कारण गलत है — कबीर के अनुसार अहंकार व माया के कारण हम ईश्वर को नहीं देख पाते, 'दिव्य-दृष्टि के अभाव' के कारण नहीं।
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