'हरिहर काका' कहानी के आधार पर वर्तमान समाज में रिश्तों की अहमियत केवल स्वार्थ तक सीमित रह गई है। हरिहर काका के भाइयों ने उन्हें तब तक अनदेखा किया जब तक उनकी संपत्ति का लालच नहीं जागा। जैसे ही जायदाद की चिंता हुई, वे उनकी सेवा में लग गए। महंत जी ने भी प्रेम और धर्म का ढोंग केवल पंद्रह बीघे खेत हड़पने के लिए रचा।
जब हरिहर काका ने ज़मीन लिखने से इनकार किया, तो भाइयों ने भी उनके साथ वही क्रूर व्यवहार किया जो महंत ने किया था। इससे स्पष्ट है कि आज के समाज में खून के रिश्ते भी संपत्ति के सामने गौण हो जाते हैं। रिश्तों में सच्चा प्रेम नहीं, बल्कि आर्थिक स्वार्थ बोलता है।
Source: हरिहर काका, पाठ 1
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