'कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती' — इस तथ्य की पुष्टि टोपी और इफ्फन की दादी के संबंध से होती है। टोपी हिंदी बोलता था और इफ्फन की दादी पूरबी बोलती थीं, फिर भी दोनों के बीच गहरा स्नेह था। दादी उसे प्यार से 'अम्माँ' जैसे शब्द सिखाती थीं और कहानियाँ सुनाती थीं। भाषा भिन्न होने पर भी दोनों के बीच अटूट भावनात्मक रिश्ता बना।
आज के जीवन में भी यही देखा जाता है — जैसे किसी बाज़ार में एक तमिल दुकानदार और हिंदी भाषी ग्राहक इशारों और मिश्रित भाषा में सहजता से व्यवहार कर लेते हैं, क्योंकि आपसी संवाद की इच्छा ही असली भाषा होती है।
Source: टोपी शुक्ला, खंड 2
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