'अभीष्ट मार्ग' पर आगे बढ़ते हुए कवि ने यह ध्यान रखने की बात कही है कि आपस में मेल-जोल बना रहे और भिन्नता न बढ़े। सभी लोग एक ही पंथ के सतर्क पथिक बनकर विपत्तियों और विघ्नों को हँसते हुए ढकेलते आगे बढ़ें।
Source: मनुष्यता (कविता), chapter 3
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परीक्षक इस श्लोक की अंतिम दो पंक्तियों पर ध्यान देते हैं — "घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी / अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।" उत्तर में 'हेलमेल', 'भिन्नता न बढ़े' और 'सतर्क पथिक' — ये तीनों भाव आने चाहिए। दो अंक के लिए यही पर्याप्त है।