लेखक का जापानी मित्र उसे एक टी-सेरेमनी (चाय-पान की परंपरागत जापानी विधि) में ले गया। वह स्थान एक छोटा-सा, शांत और सुसज्जित कमरा था जहाँ तीन-चार लोग ही बैठ सकते थे।
वहाँ का वातावरण पूर्णतः शांत और तनावरहित था। चाय बनाने और पीने की पूरी प्रक्रिया अत्यंत धीमी, सुव्यवस्थित और ध्यानपूर्वक की जाती थी। लेखक ने अनुभव किया कि उस शांत वातावरण में उसके मन की सारी भाग-दौड़ और बेचैनी समाप्त हो गई। मन को गहरी शांति मिली और वह पूरी तरह 'वर्तमान क्षण' में जीने लगा। इसीलिए लेखक उस वातावरण से गहराई से प्रभावित हुआ।
Source: पतझर में टूटी पत्तियाँ, झेन की देन — Chapter 13
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